5 ऐ मेरी जान, तू क्यूँ गिरी जाती है?
तू अन्दर ही अन्दर क्यूँ बेचैन है?
ख़ुदा से उम्मीद रख, क्यूँकि उसके नजात बख़्श दीदार की ख़ातिर
मैं फिर उसकी सिताइश करूँगा।
5 ऐ मेरी जान, तू क्यूँ गिरी जाती है?
तू अन्दर ही अन्दर क्यूँ बेचैन है?
ख़ुदा से उम्मीद रख, क्यूँकि उसके नजात बख़्श दीदार की ख़ातिर
मैं फिर उसकी सिताइश करूँगा।