1 या रब्ब, नसल दर नसल, तू ही हमारी पनाहगाह रहा है।
2 इससे पहले के पहाड़ पैदा हुए,
या ज़मीन और दुनिया को तूने बनाया,
इब्तिदा से हमेशा तक तू ही ख़ुदा है।
1 या रब्ब, नसल दर नसल, तू ही हमारी पनाहगाह रहा है।
2 इससे पहले के पहाड़ पैदा हुए,
या ज़मीन और दुनिया को तूने बनाया,
इब्तिदा से हमेशा तक तू ही ख़ुदा है।