1 मैं अपनी ही आवाज़ बुलंद करके ख़ुदावन्द से फ़रियाद करता हूँ
मै अपनी ही आवाज़ से ख़ुदावन्द से मिन्नत करता हूँ।
2 मैं उसके सामने फ़रियाद करता हूँ,
मैं अपना दुख उसके सामने बयान करता हूँ।
3 जब मुझ में मेरी जान निढाल थी,
तू मेरी राह से वाक़िफ़ था!
जिस राह पर मैं चलता हूँ उसमे उन्होंने मेरे लिए फंदा लगाया है।
4 दहनी तरफ़ निगाह कर और देख,
मुझे कोई नहीं पहचानता। मेरे लिए कहीं पनाह न रही,
किसी को मेरी जान की फ़िक्र नहीं।
5 ऐ ख़ुदावन्द, मैंने तुझ से फ़रियाद की;
मैंने कहा, तू मेरी पनाह है,
और ज़िन्दों की ज़मीन में मेरा बख़रा।