1 ऐ ख़ुदा! मुझ पर रहम फ़रमा,
क्यूँकि इंसान मुझे निगलना चाहता है;
वह दिन भर लड़कर मुझे सताता है।
3 जिस वक़्त मुझे डर लगेगा,
मैं तुझ पर भरोसा करूँगा।
4 मेरा फ़ख़्र ख़ुदा पर और उसके कलाम पर है।
मेरा भरोसा ख़ुदा पर है,
मैं डरने का नहीं:बशर मेरा क्या कर सकता है?
8 तू मेरी आवारगी का हिसाब रखता है;
मेरे आँसुओं को अपने मश्कीज़े में रख ले।
क्या वह तेरी किताब में लिखे नहीं हैं?
11 मेरा भरोसा ख़ुदा पर है, मैं डरने का नहीं।
इंसान मेरा क्या कर सकता है?