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भजन संहिता 45

रधबजआळतर शन्‍रहविों मशि

1 मन एक दर उम

उमडरहै,

मन्‍रचउस ीं

ूं; एक अनभवखक कलम ै।

2 णसां औलरयदर ै;

ां अनरह भरयै;

इस करकपरमसवर सदतर आश

िै।

3 , अपणतलवभव

अर रतअपणकमर ाँ!

4 सच्‍, नमरतअर धरजरिअपण

ऐश्‍वरअर रतमयसवो;

तन्‍भयनक िै!

5 ै,

श-दणस ैंे;

मनां मन उनतिैंे।

6 परमसवर, िंसन45:6 तेरा सिंहासन राज्य जो परमेसवर नै दिया सै सदसरवदबण

रहा;

जदणै।

7 तन्‍िकतअर ै।

इस करकपरमसवर ाँ, परमसवर

िाँ घणआनन

अभिकरयै।

8 कपड़े, गनधरस, अगर, अर

खसबै,

ाँमनदरां रआळां

रण ै।

9 रतिििरबिाँ जकै;

ओडपटरी, ओपदन

सजखड़ी ै।

10 जक, अर लगे;

अपणणसां अर अपणिघर ा;

11 अर करा।

ूँरभै, उसआदर कर

12 नगर जकउपहतर

ओड़ै ी,

रजधनणस तन्‍करण

जतन करें।

13 जकमहल बसरत ै,

उसकलतां ्‍कढ़े ै;

14 लति

हची।

ितनउसकसहै,

उसकै-हची।

15 आननिअर मगन हचैंी,

अर महल खल ैंी।

16 वजां जगहां ैंे;

िीं धरतरधबणा।

17 इसकरुँा, चऱी

़ी तक ोंरहवी;

इस रण श-दसदा-सद

धनयवकरदरहवैंे।

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