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भजन संहिता 64

अनरथकिाँ रकषण

रधबजआळतर ऊद भजन

1 परमसवर, िँ, तब ;

मन बणभय बखत िजत कर

2 करिों िै,

अर अनरथकिाँ ्‍लडआडो।

3 उननअपणीं तलवतरिां करयै,

अर अपणकडवचनां ां चढ़ाै;

4 खरणस ै;

धडउस ीं णचक ै।

5 करण िमत करै;

ितर तचकरै;

अर कहवै, "64:5 म्हारे उन चिज्जां ीं ा?"

6 िलतजनि़ै ै;

अर कहवै, "हमनपक्‍तरकि़ी ै।"

ूँणस मन िकपट भरै!

7 पर परमसवर उनपचला;

णचक यल ैंे।

8 अपणवचनां रण ्‍कर िपड़ैंे;

ितनउनपिांकरैंअपणे-अपणिि

9 डर ैंे;

अर परमसवर ां िकरैंे,

अर परमसवर ां भली-ाँि समझें।

10 धरयहरण उसकशरण ा,

अर मन आळबड़ाकरैंे।

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