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भजन संहिता 2

ज-तिलक

1 ि-ि णस ूँ मचै,

अर श-दणस ूँ िरचण गरै?

2 यहअर उसकिधरतिलकै,

अर िआपपस िरचकै, कहवै,

3 "आओ, हम उनकबनधनां ा,

अर उनकरसिाँ अपणउपपर उत्‍ां।"

4 ै, ा,

रभउनकमजउड़ाा।

5 उनतकरा,

अर आककहकउननडरा,

6 "मन्‍अपण

अपणपविपरवत ि2:6 सिय्योन सिय्योन का पर्वत जिसनै यरुशलेम नगर कह्या जावै था, जड़ै राजा सुलैमान नै मन्दर बणवाया था। जगदििै।"

7 उस वचन रचकरुँा,

यहकहा, "ै,

आज मन्‍ीं जनै।

8 ाँ, अर ि-ि णसां समपति तर,

अर र-दां अपणधरतबणण तर िुँा।

9 उननडण्‍कड़े-कड़े करा।

बरतन तरिां उननचकणकर ा।"

10 इस करकइब, ं, अकलमबणो;

धरतकरण आळो, वध

11 डरदयहभकि करो,

अर ाँबदमगन

12 करो, इसआवै,

अर थम ;

ूँपलभर उसकभडकण आळै।

धनउस शरण ै।

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