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Salmos 17

रकषण तर थन

ऊद थन

1 यहपरमसवर सच्‍वचन , ओडे।

थनओडिकपट ुँिकड़ै लगा।

2 कदमसलो!

रहवै।

3 मन परखदमन्‍िा,

मन्‍परखदपण ा;

ुँअपरिकड़ैी।17:3 मेरै मुँह तै अपराध की बात न्ही लिकड़ैगी दुसरयां की तरियां मेरे मुँह तै अपराध की बात न्ही लिकड़ैगी

4 नवां ुँवचन जरि

अधरिाँ अपणे-आप ीं बचा।

5 ाँ मजबिरहवै, िसळी।

6 परमसवर, मन्‍थनकरै, ूँमन्‍जवा।

अपणओडलगिनते।

7 अपणअपण

शरणगतां ििाँ बचै,

अपणअदभकरिा।

8 अपणां तलतरिां िजत कर,

अपणां तळमन्‍लह,

9 उन ां करै,

मनां मन्‍खड़े ै।

10 उननअपणमन करड़े कर िै;

उनकुँघमणिकड़ै ै।

11 उननकदम-कदम ीं रयै;

ीं धरतपटकण तर

लगै।

12 उस तरिां अपणिलसकरै,

अर जवतरिां लगजगहां रहवै।

13 उठ, यहा!

उसकमनकर अर उसनपटक े!

अपणतलवबचे।

14 अपणबढ़ायहा, मन्‍णसां बचा,

िणसां िनकइसवन ै,

अर िनकअपणभणभरै।

ळ-बच्‍ां ै; अर ्‍समपति अपणळकां तर ै।

15 पर धरुँुँ

िूंतब वर

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